Thursday, July 30, 2009

उस सतस्‍वरूप –चितमय अर्थात ज्ञानमय एवं आनन्‍दसागर की जय हो। हम सभी उस शाश्‍वत- जयसच्चिदानंद परमात्‍मा के अंश है। अंशी के गुण अंश में होते हैं। हां सामर्थ्‍य का भेद अवश्‍य है। उदाहरणार्थ गंगाजी के गुण लोटे के गंगा जल में होते हुए भी लोटे के गंगा जल से हजारों व्‍यक्तियों की प्‍यास नहीं बुझ सकती जबकि गंगाजी लाखों-करोड़ो व्‍यक्तियों की प्‍यास बुझा सकती हैं। ऐसे ही जयसच्चिदानंद के अंश होते हुए भी हमारे अन्‍दर उतनी शक्ति नहीं है। हां गुणों की समानता हेतु इच्‍छुक सभी हैं। सत का अर्थ शाश्‍वत-सदा जीवित रहने की इच्‍छा हर प्राणी मे है। ज्ञान का अर्थ जानकारी की चाहत भला किसको नहीं है। और आनन्‍द की इच्‍छा का तो सारा पसारा चल रहा है। इच्‍छाऐं तो ठीक हैं, परन्‍तु सारी कार्यवाही गलत है। नश्‍वर शरीर को शाश्‍वत बनाने का प्रयत्‍न ना पहले पूरा हुआ न सम्‍भावना ही है। शास्‍त्र-ज्ञान को महापुरूष वास्‍तविक ज्ञान तक पहुंचाने की सीढ़ी मात्र मानते है। हम सीढ़ी पर ही अटके रहकर मंजिल तक नहीं पंहुच पाते। ‘आग के पास जाकर ठण्‍डक की चाह’ के सदृश्‍य ही भौतिक-सामानों में हम आनन्‍द की खोज कर रहे हैं।

भक्ति सुख का मूल है, भक्ति सुख की खान
माया तज भक्ति करे, पावे पद निर्वाण

विभिन्नا भाषाओं में जय सच्चिदानंद
Devnagri- जय सच्चिदानंद

English- JAI सचिदानंद

Punjabi- ਜਯ ਸਚਿਦਾਨਂਦ

Gujarati- જય સચિદાનંદ

Kannada-ಜಯ ಸಚಿದಾನಂದ

Tamil-ஜய ஸசிதாநஂத

Bengali-জয সচিদানংদ

Telegu- జయ సచిదానంద

Malayalam-ജയ സചിദാനംദ

Urdu جی سچدانند

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